Tuesday, 24 February 2015

गजब का है कैदी किचन

कल्पना कीजिए, आप जेल में हों। पुलिसकर्मी आपको खाने का मेन्यू लाकर दें और खाना कैदी परोस रहे हों तो आपको कैसा लगेगा? हैरान होने की बात नहीं है। चेन्नई के मायलापोर में एक ऐसा रेस्टोरेंट है, जहां ग्राहकों को सलाखों के पीछे बिठाया जाता है। वेटर पुलिस की वर्दी में होते हैं और खाना परोसने वाले बैरे कैदी के रूप में। यह अजीबोगरीब रेस्टोरेंट का नाम कैदी किचन है।
आठ हजार स्क्वायर फीट के कैदी किचन में 8 सेल बने हैं। यहां का डायनिंग चेयर भी पुलिस स्टेशन की चेयर जैसा है। रेस्टोरेंट फूल्ली एसी है। अंदर जाते ही बनावट देखकर ऐसा लगता है कि जैसे जेल में आ गए हों। यहां का खाना बेहद लजीज है। इस रेस्टोरेंट के मालिक का नाम रोहित ओझा है। उनकी मानें तो इस तरह का रेस्टोरेंट खोलने के पीछे उद्देश्य यह है कि लोग कानून की अहमियत समझें और अपराध से दूर रहें।

Monday, 23 February 2015

जींस पहनने पर महिला से तालीबानी बर्ताव

बिहार के दरभंगा में लड़कियों को जींस न पहनने की चेतावनी दी गई है। दरभंगा के डीएम आवास के पास एक लड़की बेसुध मिली, जिसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। वहीं, लड़की के पास फेंका गया एक पत्र मिला, जिसमें चेतावनी लिखी गई थी- लड़कियों का जींस-पैंट-शर्ट पहनना भारतीय संस्कृति में नहीं है। जींस पहनना बंद करो, नहीं तो दो दिन बाद लड़कियों की बिना कपड़े में ऐसे ही लाश मिलेगी। अब से जींस-पैंट दरभंगा में नहीं चलेगा।
डीएम के आवास के पास सोमवार की दोपहर वह युवती बेसुध अवस्था में देखी गई। लोगों ने तत्काल इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दी। पुलिस ने लड़की को बेहोशी की हालत में इलाज के लिए डीएमसीएच में भर्ती कराया। उसका इलाज चल रहा है। लड़की के होश में आने के बाद ही पता चल सकेगा कि उसकी यह हालत किसने की।
पुलिस ने लड़की के पास से मिले बैग से उसका नाम पते की जानकारी पाई। तीन पत्र भी बरामद किए गए। वह झारखंड के गिरिडीह जिले के नौवाडीह की रहने वाली है। दरभंगा में ओएसिस मार्केटिंग कंपनी में सेल्सगर्ल है।
पुलिस ने पूछताछ के लिए कंपनी के प्रबंधक रवि कुमार को हिरासत में लिया है। पुलिस इस मामले में लड़की के होश में आने का इंतजार कर रही है। प्रबंधक से लड़की के संबंध में जानकारी हासिल की जा रही है। अभी खुलासा नहीं हुआ है।
दरभंगा के वरीय पुलिस अधीक्षक मनु महाराज ने कहा कि मामले की पड़ताल की जा रही है। सभी बिंदुओं पर अनुसंधान किया जा रहा है। बैग से मिले कागजातों से पुलिस को लड़की का नाम-पता मिला है।

एसिड अटैक की दर्दनाक कहानी है लक्ष्मी जिसे मिला आलोक का प्यार


वो 15 साल की थी और बड़ी होकर एक कामयाब सिंगर बनना चाहती थी। मगर सिर्फ एक 'ना' यानी कि इंकार ने उसके सारे सपनों को जला कर रख दिया और उसकी जिंदगी बदल गई। उसके उपर हमला हुआ। वो भी ऐसा-वैसा हमला नहीं बल्कि वो हमला जो जिस्‍म के साथ-साथ आत्‍मा भी जला देता है। इस हमले के जख्‍म से रिसने वाले मवाद तो एक समय के बाद बंद हो जाते हैं मगर इसका दर्द पूरी जिंदगी रिसता रहता है। इस हमले में हो सकता है कि शिकार होने वाले की जान चली जाए। अगर वो बच गया तो समाज उसे दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है। जिंदगी बेहद बोझिल व दर्दनाक हो जाती है और वो तिल-तिल कर जीने को मजबूर हो जाता है। हम बात कर रहे हैं एसिड अटैक (तेजाबी हमले) की। जरा सोचिए कि हमारे चेहरे पर कोई दाग लग जाता है तो हम उसे जल्‍द से जल्‍द साफ करने के लिये दौ़ड़ते है और तबतक बेचैन रहते हैं जबतक चेहरा पहले जैसा ना हो जाये। ऐसे में उन लोगों की बेचैनी का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो एसिड अटैक का शिकार बनते हैं। आज इसी कड़ी में एक ऐसी एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी की जिंदगी पर चर्चा करने वाले हैं जिसका चेहरा दरिंदों ने तेजाब से बिगाड़ तो दिया मगर उसके हौसलों का बाल त‍क बांका नहीं कर सके। जी हां उस पीड़िता का नाम लक्ष्‍मी है जिसने हमले के बाद से समाज में अपने हक के लिए आवाज उठानी शुरु की। आज लक्ष्मी देश में एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। अब अगर बात लक्ष्‍मी की हो रही हो तो उस सख्‍श को कैसे भूला जा सकता है जिसने लक्ष्‍मी के अंदर जीने का जज्‍बा भरा और उसे समाज के एक प्‍लेटफार्म पर लाकर खड़ा किया। सिर्फ लक्ष्‍मी के अंदर ही नहीं बल्कि उन तमाम एसिड अटैक पीड़िताओं के अंदर इस युवक ने वो दम भरा जिससे वो अपनी आवाज बुलंद कर सकें। इस व्‍यक्ति ने बुरी दुनिया में नि:स्‍वार्थ और पवित्र प्रेम की एक नई परिभाषा भी गढ़ी। सरकारी नौकरी छोड़कर एसिड अटैक पीड़िताओं के लिये मुहिम (http://www.stopacidattacks.org/) चलाने वाले इस सख्‍स का नाम आलोक दीक्षित है। तो चलिए आज आपको लक्ष्‍मी और आलोक की जिंदगी के उन पहुलुओं को रूबरू करवाते हैं जो इन दोनो ने वनइंडिया से खास बातचीत के दौरान शेयर किया। उस दर्दनाक पल को याद कर कांप सिहर उठती है लक्ष्मी सूरज तो उस दिन भी रौशनी लेकर निकला था मगर लक्ष्‍मी की जिंदगी में अंधेरा कर गया। उस दर्दनाक सुबह की भयावह कहानी बताते हुए लक्ष्‍मी कांप गई। लक्ष्‍मी ने बताया कि बात 2005 की है जब उसकी उम्र 15 साल थी और वो 7वीं कक्षा में पढ़ती थी। उसकी उम्र के दोगुने से भी बड़े उम्र (32 वर्ष) के एक व्‍यक्ति ने उसे शादी के लिये प्रपोज किया। लक्ष्‍मी ने उसे इंकार कर दिया। लक्ष्‍मी ने बताया कि 22 अप्रैल 2005 की सुबह लगभग 10 बजकर 45 पर वो दिल्‍ली के भीड़-भाड़ वाले इलाके खान मार्केट में एक बुक स्‍टोर पर जा रही थी कि वो युवक अपने छोटे भाई की गर्लफ्रेंड के साथ आया और उसे धक्‍का दे दिया। धक्‍का लगते ही लक्ष्‍मी सड़क पर गिर गई और उस युवक ने उसके उपर तेजाब फेंक दिया। आप अंदाजा नहीं लगा सकते हैं उस दर्द का जो शरीर पर तेजाब गिरने से होता है लक्ष्‍मी ने बताया कि भगवान का शुक्र रहा कि मैंने उसके हमले को भांपते हुए अपनी आँखों को तुरन्त हाथ से ढक दिया था जिसके कारण मेरी आंखे बच पाई और आज मै आप लोगों को देख और समझ पा रही हूं। उसने बताया कि पहले तो मुझे ठंडा सा लगा है फिर मेरा शरीर तेजी से जलने लगा था। कुछ ही सेकण्ड में मेरे चेहरे और कान के हिस्सों से मांस जलकर जमीन पर गिरने लगा एसिड बहुत तेज था जिसकी वजह से चमड़ी के साथ-साथ मेरी हड्डियां भी गलनी शुरू हो गई थीं। लक्ष्‍मी ने बताया कि वो 2 महीने से ज्‍यादा समय तक राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में भर्ती रहीं। अस्‍पताल से निकलने के बाद घर आकर जब उन्‍होंने शीशा देखा तो उन्‍हें अहसास हो गया कि उनकी जिंदगी अब उजड़ चुकी है। आलोक ने संवार दी लक्ष्‍मी की जिंदगी लक्ष्‍मी ने बताया कि वो लंबे समय तक पुरुषों से नफरत करती रही। उन्‍होंने बताया कि प्‍यार नाम के शब्‍द से तो उन्‍हें डर लगता था। मै प्रेम भरे गीत तो गाया करती थी मगर उनके शब्द मेरे लिए खोखले थे। उनका ये नजरिया तब तक रहा, जब तक वो आलोक दीक्षित से नहीं मिली थीं। आलोक दीक्षित कानपुर के रहने वाले हैं और पत्रकार रह चुके हैं। उनकी मुलाकात लक्ष्मी से तेजाब हमलों को रोकने की एक मुहिम के दौरान हुई और फिर उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया। अब ये दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और अपने छोटे से दफ्तर से मिल कर तेजाब हमलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। उनकी इस मुहिम से तेजाब हमलों की लगभग 50 पीड़ित जुड़ी हुई हैं। लक्ष्मी इस मुहिम का चेहरा है जो एसिड अटैक की पीड़ितों को मदद और आर्थिक सहायता मुहैया कराती है। लक्ष्‍मी का कहना है कि आलोक उनके लिये ताजा हवा के झोंके की तरह थे। लक्ष्‍मी ने बताया कि मैं बहुत घुटन और बोझ महसूस कर रही थी और मैने महसूस किया कि वो मेरे साथ इस बोझ को मिलकर उठाने के लिये तैयार हैं। आलोक की उम्र 25 साल है और वो अपनी नौकरी छोड़ कर इस मुहिम से जुड़े हैं। वो कहते हैं कि आपसी सम्मान और एक साथ रहने की भावना प्यार में महकती है। लक्ष्‍मी के बारे में आलोक का कहना है कि वो उनका सम्‍मान करते हैं। आलोक दीक्षित बताते हैं कि लक्ष्‍मी ने दूसरी पीड़ित महिलाओं को भी आत्मविश्वास दिया है जो उन्हें उम्मीद की किरण के तौर पर देखती हैं। लक्ष्मी ने इन महिलाओं को घर से बाहर निकलने की ताकत दी है। साथ रहेंगे पर शादी नहीं करेंगे लक्ष्‍मी कहती हैं कि आलोक उनके प्रिंस चार्मिंग हैं। एक सवाल जो अकसर इन दिनों लक्ष्मी और आलोक से पूछा जाता है, वो है क्या वो शादी करेंगे? इस सवाल के जवाब में आलोक का कहना है कि हम साथ रहेंगे लेकिन शादी नहीं करेंगे। हम सामाजिक प्रतिबंधों के खिलाफ लड़ रहे हैं, चाहे वो शादी हो या फिर हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाला बर्ताव। हम ख़ुद कैसे इसका हिस्सा बन सकते हैं? बहुत दिनों पहले आलोक ने अपनी इस बात को फेसबुक पोस्‍ट पर भी लिखकर स्‍पष्‍ट कर दिया था। हालांकि लक्ष्मी को विश्वास है कि किसी न किसी दिन वो शादी के बंधन में बंधेंगे। पिछले साल उनकी तरफ़ से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी क्लिक करें राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वो तेजाब की बिक्री के लिए नीति तैयार करें। लक्ष्मी कहती हैं कि मैं तेज़ाब हमले की अन्य पीड़ितों के संपर्क में आई। मैंने सोचा कि ये ठीक नहीं है कि तेज़ाब यूं ही कहीं भी उपलब्ध हो। कोई भी इसे खरीद सकता है। इससे तो महिलाओं के लिए खतरा पैदा होता है। अब आलोक दीक्षित और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर लक्ष्मी ने लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए एक मुहिम (स्‍टॉप एसिड अटैक http://www.stopacidattacks.org/) छेड़ी है ताकि हमले की स्थिति में वो हस्तक्षेप कर उससे बेहतर तरीके से निपट सकें। जब शरीर पर गिरता है तेजाब जब शरीर के किसी हिस्से पर एसिड गिराया जाता है, तो उस हिस्से की त्वचा के टीशू नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें पहले जैसा होने में लंबा वक्त लगता है और कई बार तो वे इस लायक रह भी नहीं जाते कि फिर से उस अवस्था में लौट सकें। इसके इलाज की प्रक्रिया काफी धीमी, लंबी और साथ ही महंगी है। यह खर्च वहन करना आसान नहीं है। आश्चर्य है कि फिर भी एसिड अटैक को गंभीर अपराध की श्रेणी में न रखकर आरोपियों को साधारण बेल पर छोड़ दिया जाता है। स्‍टॉप एसिड अटैक कैम्‍पेन चलाने वाले आलोक दीक्षित ने बताया कि इस मामले को सरकार अगर गंभीरता से ले तो शायद ऐसी वारदातें कम हो जाएं।



(साभार - अंकुर कुमार)

Saturday, 21 February 2015

भारत की पांच बेहद डरावनी जगह

भारत को उसके प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और पुरातात्विक महत्व के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इसी वजह से यहां पर्यटक खींचे चले आते हैं, लेकिन यहां भी ऐसी कई रहस्यमयी जगहें मौजूद हैं, जहां भूतों और आत्माओं का बसेरा होने के किस्से आम हैं। इस वजह से यहां पर्यटक जाने से कतराते हैं। आइए, आपको बताते हैं इन भूतहा जगहों के बारे बताते हैं।

कुलधारा, राजस्थान

जैसलमेर से करीब 18 किलोमीटर दूर इस गांव के बारे में किंवदती है कि यह एक शापित जगह है। इस गांव के वीराने के पीछे एक सुंदर लड़की की कहानी छिपी है। कहा जाता है कि इस गांव के मुखिया की सुंदर बेटी के रूप पर मोहित जैसलमेर के दीवान सालिम सिंह मुखिया उसे अपने हरम में लाना चाहता था। इसके लिए उसने गांववालों पर दबाव बनाया। ऐसे में एक रात गांव वालों ने पंचायत कर अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिए पूरा गांव रातों रात खाली कर दिया। कहते हैं कि जाते वक्त पालीवाल ब्राह्मणों ने गांव को शाप दिया कि अब यह कभी दोबारा नहीं बस सकेगा। तब से यह गांव वीरान पड़ा है। कहते हैं कि यहां रात में भूत-प्रेत और अजब-अजब सी आवाजें आती हैं। इसी वजह से गांव के बाहर एक बड़ा सा दरवाजा लगा दिया गया है।

जटिंगा वैली, असम

असम के सिलचर शहर से 80 किलोमीटर दूर यह वैली मौजूद है। एक लोककथा के अनुसार, इस वैली में हर अंधेरी रात में पक्षी संदेहास्पद स्थिति में आत्महत्या कर रहे थे। यहां हर साल प्रवासी पक्षी आते तो थे, लेकिन उनमें वापस लौटकर कोई नहीं जा पाता। इसकी वजहों को जानने की कोशिश वैज्ञानिकों ने भी की थी।

जीपी ब्लॉक, मुंबई

यह भी भारत की काफी डरावनी जगहों की फेहरिस्त में शुमार है, क्योंकि यहां कई बेहद विचित्र घटनाएं घटी हैं। माना जाता है कि इस दो मंजिला इमारत में बुरी आत्माओं का घेरा है। स्थानीय लोगों ने यहां कई बार चार लड़कों को घर के अंदर टेबल पर धीमी मोमबत्ती की रोशनी में बीयर पीते हुए देखा है। कुछ लोगों ने लड़कियों को भी लाल कपड़े पहनकर अंदर जाते देखा है। इस इमारत की छत पर अकसर इन चार सायों को देखा जाता है।

भानगढ़ का किला, राजस्थान

राजस्थान के अलवर जिले में स्थित इस किले को भारत के भूतहा किले के रूप में जाना जाता है। किंवदती है कि एक तांत्रिक के शाप के चलते यह किला एक रात में ही खंडहर बन गया और तभी से यहां भूतों का राज चलता है। यहां रात में रुकना मना है और कोई भी यहां रात गुजारने की हिम्मत नहीं जुटा सका।

माहिम की डिसूजा चॉल, मुंबई

महानगर मुंबई के माहिम इलाके में मौजूद डिसूजा चॉल भी डरावनी जगहों में से एक है। अगर कहानियों पर यकीन करें तो यहां कुएं से पानी खींचने गई एक महिला उसमें गिरकर मर गई थी। लोगों का कहना है कि तब से आज तक इस महिला का भूत उसी कुएं के आसपास देखा जाता है।

(साभार : दैनिक जागरण)

'प्रेम' की खातिर जन्मा पाकिस्तान

पाकिस्तान का नाम सुनते ही हम हिंदुस्तानी आग-बबूला हो उठते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे दिल में भाईचारे की भावना नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि हम धर्म और जात-पात को लेकर भेद करते हैं। पर पाक ने 'पाक' का अर्थ नहीं समझा और यही कारण है कि पाकिस्तान के प्रति हमारी सोच नकारात्मक है। शायद, हमें मालूम नहीं है कि पाकिस्तान का जन्म 'प्रेम' की खातिर हुआ था। कभी हिंदुस्तान के भक्त रहे मोहम्मद अली जिन्ना और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शब्दों में 'कायदे आजम' ने अगर देश का बंटवारा कराया तो इसकी पीछे उनका मकसद कुछ और था। चूंकि यह काफी संवेदनशील मुद्दा है। कइयों की भावनाओं से जुड़ा है। इसलिए इसपर टिप्पणी नहीं की जा सकती। लेखकों के आलेख से जो जानकारी मिली है, मैं केवल उसे अपने पाठकों से साझा कर रहा हूं।
पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना का नाम महान नेताओं की श्रेणी में लिया जाता था। वह महात्मा गांधी के करीबी भी थी। महात्मा गांधी उन्हें कायदे आजम के नाम से बुलाते थे। अंग्रेजों से देश को मुक्त कराने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाने की भावना कैसे जागी, इसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। अधिकांश लोग जवहारलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की तरह उन्हें भी बंटवारे का दोषी मानते हैं। जिन्ना ने अपने मन का देश तो बन लिया, पर इस्लामी राष्ट्र के जन्म की प्रसव पीड़ा वह 13 महीने तक ही सह पाए।
मोहम्मद अली जिन्ना को 'रत्ती' या रतनबाई जिन्ना का जिक्र किए बिना समझना नामुमकिन है। सरोजनी नायडू ने रतनबाई को मुम्बई का पुष्प की उपाधि दी थी। दरअसल, जिन्ना से उम्र में 24 साल छोटी रत्ती उनके अजीज मित्र सर दिनशा पेटिट की पहली संतान थीं। पेटिट धर्म से पारसी थे। बात जिस वक्त की है, उस वक्त जिन्ना 40 की उम्र पार कर चुके थे। तब वह केवल हिंदुस्तानी थे। हिंदुस्तान के एक जुझारू नेता, जिनका उद्देश्य देश को अंग्रेजों से मुक्त कराना था। खुद को मुसलमान कहने पर जिन्ना भड़क जाते थे। जनवरी 1917 की बात है। एक धार्मिक सौहार्द के सम्मेलन में जब सर पेटिट ने धर्म निर्पेक्षता की बातें कहीं। अंतरधर्म विवाह को बेहतर बताया, तब जिन्ना उनके सामने रत्ती से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। उस वक्त रत्ती नाबालिग थीं। जब बात अपने पर आई तो सर पेटिट हत्थे से उखड़ गए। उन्होंने जिन्ना से रिश्ता तोड़ लिया। रत्ती और जिन्ना के मिलने पर पाबंदी लगा दी गई, लेकिन दोनों छुप-छुपकर मिलते रहे। समय के साथ-साथ उनका प्रेम परवान चढऩे लगा। 20 फरवरी 1918 को रत्ती 18 वर्ष की हुई। घर में जन्मदिन की पार्टी रखी गई थी, लेकिन वह दो जोड़ी कपड़े लिए घर से भाग गई और जिन्ना से निकाह कर लिया। हालांकि उनके रिश्ते को दोनों के घरवालों ने दिल से मंजूरी नहीं दी। दोनों के धर्म और समाज के लोग उन्हें अलग करने के बारे में ही सोचते रहे। आखिरकार दस साल तक साथ रहने के बाद एक दिन ऐसा आ ही गया, जब धर्म निर्पेक्षता के दावे करने वालों ने उन्होंने रिश्तों में खटास पैदा कर दी। रत्ती ने उनसे अलग रहने का फैसला कर लिया। वह मुम्बई के ताज होटल के एक सुइट में रहने लगीं। तब जिन्ना के जेहन में एक अलग देश बनाने का ख्वाब आया। जहां सभी एक धर्म के हों, ताकि धर्म का अंतर जोड़े को अलग न कर सके। जिन्ना ने अपने कॉम का दामन थाम लिया और नेहरू, गांधी, पटेल का साथ छोड़कर मुस्लिम लीग बना लिया। फिर, वह अपनी पार्टी को बढ़ावा देने लगे। अलग देश बनाने के जुनून में वह ऐसे डूबे की उनका ध्यान रत्ती के प्रति कम हो गया। रत्ती को गुर्दों में दर्द होने लगी। वह इसके लिए मॉर्फिन का सेवन करने लगे। मॉर्फिन का अधिक डोस ले लेने से 20 फरवरी 1929 को होटल के सुइट में उनकी मौत हो गई। अंतिम क्षणों में जिन्ना उनके साथ नहीं थे। उस दिन उनका 29वां जन्मदिन था। मेज पर जिन्ना के नाम की एक चिट्ठी रखी थी, जिसमें लिखा था 'मेरे प्रिय मैंने तुम्हें इतना प्यार किया, जितना कभी किसी पुरुष को नहीं किया. यही प्रार्थना है कि जिस ट्रेजेडी का प्रारंभ प्रेम से हुआ था, उसका अंत भी प्रेम से ही हो. गुडनाइटज्गुड बाईÓ। रत्ती की मौत के बाद जिन्ना ने राजनीतिक अभियान को और तेज कर दिया। अगस्त 1947 में पाकिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने के एक दिन पहले जिन्ना अंतिम बार मुम्बई आए और रत्ती की कब्र पर पुष्प अर्पित किया।

Wednesday, 11 February 2015

कश्मीर त्रासदी : हर दिन एक सेव खा कर बचाई जान

गोपालगंज निवासी नाजीमुल हक कश्मीर में भीषण बाढ़ के उस भयावह मंजर को शायद जिंदगी भर भुला नहीं पाएगा, जब उसने तीन मंजिली इमारत पर छह दिन तक केवल एक सेव खा कर जैसे-तैसे अपनी जान बचाई। लगभग 550 स्क्वायर फीट की छत पर वह अकेला नहीं था। उसके साथ पचास लोग और थे। छत पर तिल भर की जगह नहीं थी। ठिठुरती ठंड में एक-दूसरे को पकड़कर मौत से आंख मिचौनी खेल रहे थे। जब वह हिमगिरी एक्सप्रेस से पटना जंक्शन के प्लेटफार्म संख्या तीन पर उतरा तो होठों पर एकाएक मुस्कुराहट छा गई। 
नाजीमुल के साथ आए 43 पीडि़तों ने बताया कि वे सभी कश्मीर के माकदाह में सेंट्रिंग मिस्त्री का काम करते हैं। सभी उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों के रहने वाले हैं। वे वहां एक तीन मंजिली इमारत का निर्माण कर रहे थे। अचानक आई बाढ़ के कारण निर्माण कर रुक गया। जैसे-जैसे सड़क पर पानी का स्तर बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे माले चढ़ते गए। लगभग पंद्रह फीट पानी आने के बाद इमारत का एक तल पूरा और दूसरा तल आधा डूब गया। इसके बाद वे छत पर चले गए। उनके पास दो पेटी सेव बची थी। खाने वाले पचास। हर दिन भूख मिटाने के लिए एक सेव खाते थे, फिर पेटी बंद कर देते थे। सबके कपड़े फट गए थे, लेकिन जीवित रहने की उम्मीद में वह जैसे-तैसे खड़े रहे।
वहीं जम्मू से लौट सीआरपीएफ के जवान शक्ति चंद ने कहा कि वह छपरा का रहने वाला है। छुट्टियां समाप्त होने के बाद वह योगदान करने श्रीनगर के लालबाग जा रहा था। जम्मू तवी पहुंचने पर जानकारी मिली कि बाढ़ के कारण कश्मीर जाने का रास्ता बंद हो गया है। इसके बाद उसने जम्मू स्थित मुख्यालय में आला अफसरों से बात की। तीन दिन तक इंतजार करने के बाद उसे वापस घर भेज दिया। शक्ति चंद की मानें तो उसके अलावा करीब सौ जवानों को छुट्टी दे दी गई।