Monday, 23 February 2015

एसिड अटैक की दर्दनाक कहानी है लक्ष्मी जिसे मिला आलोक का प्यार


वो 15 साल की थी और बड़ी होकर एक कामयाब सिंगर बनना चाहती थी। मगर सिर्फ एक 'ना' यानी कि इंकार ने उसके सारे सपनों को जला कर रख दिया और उसकी जिंदगी बदल गई। उसके उपर हमला हुआ। वो भी ऐसा-वैसा हमला नहीं बल्कि वो हमला जो जिस्‍म के साथ-साथ आत्‍मा भी जला देता है। इस हमले के जख्‍म से रिसने वाले मवाद तो एक समय के बाद बंद हो जाते हैं मगर इसका दर्द पूरी जिंदगी रिसता रहता है। इस हमले में हो सकता है कि शिकार होने वाले की जान चली जाए। अगर वो बच गया तो समाज उसे दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है। जिंदगी बेहद बोझिल व दर्दनाक हो जाती है और वो तिल-तिल कर जीने को मजबूर हो जाता है। हम बात कर रहे हैं एसिड अटैक (तेजाबी हमले) की। जरा सोचिए कि हमारे चेहरे पर कोई दाग लग जाता है तो हम उसे जल्‍द से जल्‍द साफ करने के लिये दौ़ड़ते है और तबतक बेचैन रहते हैं जबतक चेहरा पहले जैसा ना हो जाये। ऐसे में उन लोगों की बेचैनी का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो एसिड अटैक का शिकार बनते हैं। आज इसी कड़ी में एक ऐसी एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी की जिंदगी पर चर्चा करने वाले हैं जिसका चेहरा दरिंदों ने तेजाब से बिगाड़ तो दिया मगर उसके हौसलों का बाल त‍क बांका नहीं कर सके। जी हां उस पीड़िता का नाम लक्ष्‍मी है जिसने हमले के बाद से समाज में अपने हक के लिए आवाज उठानी शुरु की। आज लक्ष्मी देश में एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। अब अगर बात लक्ष्‍मी की हो रही हो तो उस सख्‍श को कैसे भूला जा सकता है जिसने लक्ष्‍मी के अंदर जीने का जज्‍बा भरा और उसे समाज के एक प्‍लेटफार्म पर लाकर खड़ा किया। सिर्फ लक्ष्‍मी के अंदर ही नहीं बल्कि उन तमाम एसिड अटैक पीड़िताओं के अंदर इस युवक ने वो दम भरा जिससे वो अपनी आवाज बुलंद कर सकें। इस व्‍यक्ति ने बुरी दुनिया में नि:स्‍वार्थ और पवित्र प्रेम की एक नई परिभाषा भी गढ़ी। सरकारी नौकरी छोड़कर एसिड अटैक पीड़िताओं के लिये मुहिम (http://www.stopacidattacks.org/) चलाने वाले इस सख्‍स का नाम आलोक दीक्षित है। तो चलिए आज आपको लक्ष्‍मी और आलोक की जिंदगी के उन पहुलुओं को रूबरू करवाते हैं जो इन दोनो ने वनइंडिया से खास बातचीत के दौरान शेयर किया। उस दर्दनाक पल को याद कर कांप सिहर उठती है लक्ष्मी सूरज तो उस दिन भी रौशनी लेकर निकला था मगर लक्ष्‍मी की जिंदगी में अंधेरा कर गया। उस दर्दनाक सुबह की भयावह कहानी बताते हुए लक्ष्‍मी कांप गई। लक्ष्‍मी ने बताया कि बात 2005 की है जब उसकी उम्र 15 साल थी और वो 7वीं कक्षा में पढ़ती थी। उसकी उम्र के दोगुने से भी बड़े उम्र (32 वर्ष) के एक व्‍यक्ति ने उसे शादी के लिये प्रपोज किया। लक्ष्‍मी ने उसे इंकार कर दिया। लक्ष्‍मी ने बताया कि 22 अप्रैल 2005 की सुबह लगभग 10 बजकर 45 पर वो दिल्‍ली के भीड़-भाड़ वाले इलाके खान मार्केट में एक बुक स्‍टोर पर जा रही थी कि वो युवक अपने छोटे भाई की गर्लफ्रेंड के साथ आया और उसे धक्‍का दे दिया। धक्‍का लगते ही लक्ष्‍मी सड़क पर गिर गई और उस युवक ने उसके उपर तेजाब फेंक दिया। आप अंदाजा नहीं लगा सकते हैं उस दर्द का जो शरीर पर तेजाब गिरने से होता है लक्ष्‍मी ने बताया कि भगवान का शुक्र रहा कि मैंने उसके हमले को भांपते हुए अपनी आँखों को तुरन्त हाथ से ढक दिया था जिसके कारण मेरी आंखे बच पाई और आज मै आप लोगों को देख और समझ पा रही हूं। उसने बताया कि पहले तो मुझे ठंडा सा लगा है फिर मेरा शरीर तेजी से जलने लगा था। कुछ ही सेकण्ड में मेरे चेहरे और कान के हिस्सों से मांस जलकर जमीन पर गिरने लगा एसिड बहुत तेज था जिसकी वजह से चमड़ी के साथ-साथ मेरी हड्डियां भी गलनी शुरू हो गई थीं। लक्ष्‍मी ने बताया कि वो 2 महीने से ज्‍यादा समय तक राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में भर्ती रहीं। अस्‍पताल से निकलने के बाद घर आकर जब उन्‍होंने शीशा देखा तो उन्‍हें अहसास हो गया कि उनकी जिंदगी अब उजड़ चुकी है। आलोक ने संवार दी लक्ष्‍मी की जिंदगी लक्ष्‍मी ने बताया कि वो लंबे समय तक पुरुषों से नफरत करती रही। उन्‍होंने बताया कि प्‍यार नाम के शब्‍द से तो उन्‍हें डर लगता था। मै प्रेम भरे गीत तो गाया करती थी मगर उनके शब्द मेरे लिए खोखले थे। उनका ये नजरिया तब तक रहा, जब तक वो आलोक दीक्षित से नहीं मिली थीं। आलोक दीक्षित कानपुर के रहने वाले हैं और पत्रकार रह चुके हैं। उनकी मुलाकात लक्ष्मी से तेजाब हमलों को रोकने की एक मुहिम के दौरान हुई और फिर उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया। अब ये दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और अपने छोटे से दफ्तर से मिल कर तेजाब हमलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। उनकी इस मुहिम से तेजाब हमलों की लगभग 50 पीड़ित जुड़ी हुई हैं। लक्ष्मी इस मुहिम का चेहरा है जो एसिड अटैक की पीड़ितों को मदद और आर्थिक सहायता मुहैया कराती है। लक्ष्‍मी का कहना है कि आलोक उनके लिये ताजा हवा के झोंके की तरह थे। लक्ष्‍मी ने बताया कि मैं बहुत घुटन और बोझ महसूस कर रही थी और मैने महसूस किया कि वो मेरे साथ इस बोझ को मिलकर उठाने के लिये तैयार हैं। आलोक की उम्र 25 साल है और वो अपनी नौकरी छोड़ कर इस मुहिम से जुड़े हैं। वो कहते हैं कि आपसी सम्मान और एक साथ रहने की भावना प्यार में महकती है। लक्ष्‍मी के बारे में आलोक का कहना है कि वो उनका सम्‍मान करते हैं। आलोक दीक्षित बताते हैं कि लक्ष्‍मी ने दूसरी पीड़ित महिलाओं को भी आत्मविश्वास दिया है जो उन्हें उम्मीद की किरण के तौर पर देखती हैं। लक्ष्मी ने इन महिलाओं को घर से बाहर निकलने की ताकत दी है। साथ रहेंगे पर शादी नहीं करेंगे लक्ष्‍मी कहती हैं कि आलोक उनके प्रिंस चार्मिंग हैं। एक सवाल जो अकसर इन दिनों लक्ष्मी और आलोक से पूछा जाता है, वो है क्या वो शादी करेंगे? इस सवाल के जवाब में आलोक का कहना है कि हम साथ रहेंगे लेकिन शादी नहीं करेंगे। हम सामाजिक प्रतिबंधों के खिलाफ लड़ रहे हैं, चाहे वो शादी हो या फिर हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाला बर्ताव। हम ख़ुद कैसे इसका हिस्सा बन सकते हैं? बहुत दिनों पहले आलोक ने अपनी इस बात को फेसबुक पोस्‍ट पर भी लिखकर स्‍पष्‍ट कर दिया था। हालांकि लक्ष्मी को विश्वास है कि किसी न किसी दिन वो शादी के बंधन में बंधेंगे। पिछले साल उनकी तरफ़ से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी क्लिक करें राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वो तेजाब की बिक्री के लिए नीति तैयार करें। लक्ष्मी कहती हैं कि मैं तेज़ाब हमले की अन्य पीड़ितों के संपर्क में आई। मैंने सोचा कि ये ठीक नहीं है कि तेज़ाब यूं ही कहीं भी उपलब्ध हो। कोई भी इसे खरीद सकता है। इससे तो महिलाओं के लिए खतरा पैदा होता है। अब आलोक दीक्षित और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर लक्ष्मी ने लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए एक मुहिम (स्‍टॉप एसिड अटैक http://www.stopacidattacks.org/) छेड़ी है ताकि हमले की स्थिति में वो हस्तक्षेप कर उससे बेहतर तरीके से निपट सकें। जब शरीर पर गिरता है तेजाब जब शरीर के किसी हिस्से पर एसिड गिराया जाता है, तो उस हिस्से की त्वचा के टीशू नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें पहले जैसा होने में लंबा वक्त लगता है और कई बार तो वे इस लायक रह भी नहीं जाते कि फिर से उस अवस्था में लौट सकें। इसके इलाज की प्रक्रिया काफी धीमी, लंबी और साथ ही महंगी है। यह खर्च वहन करना आसान नहीं है। आश्चर्य है कि फिर भी एसिड अटैक को गंभीर अपराध की श्रेणी में न रखकर आरोपियों को साधारण बेल पर छोड़ दिया जाता है। स्‍टॉप एसिड अटैक कैम्‍पेन चलाने वाले आलोक दीक्षित ने बताया कि इस मामले को सरकार अगर गंभीरता से ले तो शायद ऐसी वारदातें कम हो जाएं।



(साभार - अंकुर कुमार)

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