Saturday, 21 February 2015

'प्रेम' की खातिर जन्मा पाकिस्तान

पाकिस्तान का नाम सुनते ही हम हिंदुस्तानी आग-बबूला हो उठते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे दिल में भाईचारे की भावना नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि हम धर्म और जात-पात को लेकर भेद करते हैं। पर पाक ने 'पाक' का अर्थ नहीं समझा और यही कारण है कि पाकिस्तान के प्रति हमारी सोच नकारात्मक है। शायद, हमें मालूम नहीं है कि पाकिस्तान का जन्म 'प्रेम' की खातिर हुआ था। कभी हिंदुस्तान के भक्त रहे मोहम्मद अली जिन्ना और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शब्दों में 'कायदे आजम' ने अगर देश का बंटवारा कराया तो इसकी पीछे उनका मकसद कुछ और था। चूंकि यह काफी संवेदनशील मुद्दा है। कइयों की भावनाओं से जुड़ा है। इसलिए इसपर टिप्पणी नहीं की जा सकती। लेखकों के आलेख से जो जानकारी मिली है, मैं केवल उसे अपने पाठकों से साझा कर रहा हूं।
पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना का नाम महान नेताओं की श्रेणी में लिया जाता था। वह महात्मा गांधी के करीबी भी थी। महात्मा गांधी उन्हें कायदे आजम के नाम से बुलाते थे। अंग्रेजों से देश को मुक्त कराने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाने की भावना कैसे जागी, इसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। अधिकांश लोग जवहारलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की तरह उन्हें भी बंटवारे का दोषी मानते हैं। जिन्ना ने अपने मन का देश तो बन लिया, पर इस्लामी राष्ट्र के जन्म की प्रसव पीड़ा वह 13 महीने तक ही सह पाए।
मोहम्मद अली जिन्ना को 'रत्ती' या रतनबाई जिन्ना का जिक्र किए बिना समझना नामुमकिन है। सरोजनी नायडू ने रतनबाई को मुम्बई का पुष्प की उपाधि दी थी। दरअसल, जिन्ना से उम्र में 24 साल छोटी रत्ती उनके अजीज मित्र सर दिनशा पेटिट की पहली संतान थीं। पेटिट धर्म से पारसी थे। बात जिस वक्त की है, उस वक्त जिन्ना 40 की उम्र पार कर चुके थे। तब वह केवल हिंदुस्तानी थे। हिंदुस्तान के एक जुझारू नेता, जिनका उद्देश्य देश को अंग्रेजों से मुक्त कराना था। खुद को मुसलमान कहने पर जिन्ना भड़क जाते थे। जनवरी 1917 की बात है। एक धार्मिक सौहार्द के सम्मेलन में जब सर पेटिट ने धर्म निर्पेक्षता की बातें कहीं। अंतरधर्म विवाह को बेहतर बताया, तब जिन्ना उनके सामने रत्ती से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। उस वक्त रत्ती नाबालिग थीं। जब बात अपने पर आई तो सर पेटिट हत्थे से उखड़ गए। उन्होंने जिन्ना से रिश्ता तोड़ लिया। रत्ती और जिन्ना के मिलने पर पाबंदी लगा दी गई, लेकिन दोनों छुप-छुपकर मिलते रहे। समय के साथ-साथ उनका प्रेम परवान चढऩे लगा। 20 फरवरी 1918 को रत्ती 18 वर्ष की हुई। घर में जन्मदिन की पार्टी रखी गई थी, लेकिन वह दो जोड़ी कपड़े लिए घर से भाग गई और जिन्ना से निकाह कर लिया। हालांकि उनके रिश्ते को दोनों के घरवालों ने दिल से मंजूरी नहीं दी। दोनों के धर्म और समाज के लोग उन्हें अलग करने के बारे में ही सोचते रहे। आखिरकार दस साल तक साथ रहने के बाद एक दिन ऐसा आ ही गया, जब धर्म निर्पेक्षता के दावे करने वालों ने उन्होंने रिश्तों में खटास पैदा कर दी। रत्ती ने उनसे अलग रहने का फैसला कर लिया। वह मुम्बई के ताज होटल के एक सुइट में रहने लगीं। तब जिन्ना के जेहन में एक अलग देश बनाने का ख्वाब आया। जहां सभी एक धर्म के हों, ताकि धर्म का अंतर जोड़े को अलग न कर सके। जिन्ना ने अपने कॉम का दामन थाम लिया और नेहरू, गांधी, पटेल का साथ छोड़कर मुस्लिम लीग बना लिया। फिर, वह अपनी पार्टी को बढ़ावा देने लगे। अलग देश बनाने के जुनून में वह ऐसे डूबे की उनका ध्यान रत्ती के प्रति कम हो गया। रत्ती को गुर्दों में दर्द होने लगी। वह इसके लिए मॉर्फिन का सेवन करने लगे। मॉर्फिन का अधिक डोस ले लेने से 20 फरवरी 1929 को होटल के सुइट में उनकी मौत हो गई। अंतिम क्षणों में जिन्ना उनके साथ नहीं थे। उस दिन उनका 29वां जन्मदिन था। मेज पर जिन्ना के नाम की एक चिट्ठी रखी थी, जिसमें लिखा था 'मेरे प्रिय मैंने तुम्हें इतना प्यार किया, जितना कभी किसी पुरुष को नहीं किया. यही प्रार्थना है कि जिस ट्रेजेडी का प्रारंभ प्रेम से हुआ था, उसका अंत भी प्रेम से ही हो. गुडनाइटज्गुड बाईÓ। रत्ती की मौत के बाद जिन्ना ने राजनीतिक अभियान को और तेज कर दिया। अगस्त 1947 में पाकिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने के एक दिन पहले जिन्ना अंतिम बार मुम्बई आए और रत्ती की कब्र पर पुष्प अर्पित किया।

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